श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 13: सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  4.13.87 
यद्यस्मत्परित्राणासमर्थं भवानात्मानमधिगच्छति तदयमस्मत्तस्तावन्मणि: संगृह्य रक्ष्यतामिति॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
"अच्छा, यदि तुम मेरी रक्षा करने में असमर्थ हो, तो मैं तुम्हें यह मणि देता हूँ; इसे ले लो और इसकी रक्षा करो।" ॥87॥
 
"Well, if you feel that you are incapable of protecting me, then I am giving you this gem; take it and protect it." ॥ 87॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)