श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 13: सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  4.13.85 
न हि कश्चिद्भगवता पादप्रहारपरिकम्पितजगत्त्रयेण सुररिपुवनितावैधव्यकारिणा प्रबलरिपुचक्राप्रतिहतचक्रेण चक्रिणा मदमुदितनयनावलोकिताखिलनिशातनेनातिगुरुवैरिवारणापकर्षणाविकृतमहिमोरुसीरेण सीरिणा च सह सकलजगद्वन्द्यानाममरवराणामपि योद्धुं समर्थ: किमुताहम्॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
जो अपने पैरों के आघात से तीनों लोकों को कम्पायमान कर देते हैं, देवताओं के शत्रु दैत्यों की स्त्रियों को वैधव्य प्रदान करते हैं, जिनका चक्र अत्यन्त बलशाली शत्रु सेना द्वारा भी अविचलित रहता है, जो अपने मदमस्त नेत्रों की दृष्टि से सबको वश में कर लेते हैं और जो भयंकर शत्रु हाथियों को नीचे गिराने के लिए शक्तिशाली एवं अखंडित हल धारण करते हैं, उन चक्रधारी भगवान वासुदेव के साथ समस्त लोकों द्वारा पूजित देवताओं में से कोई भी युद्ध करने में समर्थ नहीं है। फिर मैं क्या कहूँ?॥ 85॥
 
None among the gods, who are worshiped by all the worlds, is capable of fighting with Lord Vasudeva, the discus bearer, who makes the three worlds tremble with the blows of his feet, who gives widowhood to the women of the demons, the enemies of the gods, and whose discus remains unhindered even by the most powerful enemy army, and who subdues everyone with the glances of his intoxicated eyes and who holds a powerful and unbroken plough to pull down the fearsome enemy elephants. Then what about me?॥ 85॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)