श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 13: सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  4.13.72 
पितृवधामर्षपूर्णा च सत्यभामा शीघ्रं स्यन्दनमारूढा वारणावतं गत्वा भगवतेऽहं प्रतिपादितेत्यक्षान्तिमता शतधन्वनास्मत्पिता व्यापादितस्तच्च स्यमन्तकमणिरत्नमपहृतं यस्यावभासनेनापहृततिमिरं त्रैलोक्यं भविष्यति॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
पिता के वध से क्रुद्ध होकर सत्यभामा तुरन्त ही रथ पर सवार होकर वारणावत नगर में पहुँची और भगवान श्रीकृष्ण से बोली - "प्रभु! पिता ने मुझे आपके करकमलों के हवाले कर दिया था - यह सहन न कर पाने के कारण शतधन्वा ने मेरे पिता को मारकर स्यमन्तक नामक मणि छीन ली है, जिसके प्रकाश से सम्पूर्ण जगत् अन्धकाररहित हो जाएगा ॥ 72॥
 
Enraged by the killing of her father, Satyabhama immediately boarded the chariot and reached Varanavat city and said to Lord Krishna – “Lord! Father handed me over to your lotus flowers - Unable to bear this, Shatdhanvan has killed my father and has taken away the gem named Syamantak whose light will make the entire world void of darkness. 72॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)