श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 13: सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  4.13.55 
स च प्रणिपत्य पुनरप्येनं प्रसाद्य जाम्बवतीं नाम कन्यां गृहागतायार्घ्यभूतां ग्राहयामास॥ ५५॥ स्यमन्तकमणिरत्नमपि प्रणिपत्य तस्मै प्रददौ॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर जाम्बवान् ने पुनः उन्हें नमस्कार करके प्रसन्न किया और उनके घर आये हुए भगवान् को अपनी जाम्बवती नाम की कन्या भेंट की तथा उन्हें नमस्कार करके स्यमन्तक नामक मणि भी दी ॥55-56॥
 
Thereafter, Jambavan pleased him by saluting him again and gave his daughter named Jambavati as an offering to the Lord who had come to his house and after saluting him, he also gave him the precious stone Syamantak. 55-56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)