श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 13: सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  4.13.27 
अच्युतोऽपि तद्दिव्यं रत्नमुग्रसेनस्य भूपतेर्योग्यमेतदिति लिप्सां चक्रे॥ २७॥
 
 
अनुवाद
भगवान अच्युत को भी लगा कि यह दिव्य मणि राजा उग्रसेन के योग्य है।
 
Lord Achyuta also felt that this divine gem is worthy of King Ugrasena. 27.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)