श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 13: सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा  »  श्लोक 139
 
 
श्लोक  4.13.139 
दानपते जानीम एव वयं यथा शतधन्वना तदिदमखिलजगत्सारभूतं स्यमन्तकं रत्नं भवत: समर्पितं तदशेषराष्ट्रोपकारकं भवत्सकाशे तिष्ठति तिष्ठतु सर्व एव वयं तत्प्रभावफलभुज: किं त्वेष बलभद्रोऽस्मानाशङ्कितवांस्तदस्मत्प्रीतये दर्शयस्वेत्यभिधाय जोषं स्थिते भगवति वासुदेवे सरत्नस्सोऽचिन्तयत्॥ १३९॥
 
 
अनुवाद
"हे दाता! शतधन्वा ने जिस प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का साररूप स्यमन्तक नामक महान मणि आपको सौंपी थी, उसे हम सब जानते हैं। वह आपके पास है, सम्पूर्ण राष्ट्र का कल्याण करती हुई, वह वहीं रहे, हम सब उसके प्रभाव का फल भोगें; किन्तु इन बलभद्र जी ने हम पर संदेह किया है, अतः हमें प्रसन्न करने के लिए आप उसे एक बार हमें दिखा दीजिये।" ऐसा कहकर जब भगवान वसुदेव चुप हो गए, तब अक्रूरजी सोचने लगे कि जैसे उन्होंने मणि अपने पास रख ली थी -॥139॥
 
"O donor! We know everything about the way Shatdhanva had handed over to you the great gem named Syamantaka which is the essence of the entire universe. It is with you, doing good to the entire nation, let it remain there, we all enjoy the fruits of its influence, but this Balabhadra ji doubted us, so to please us, please show it to us once." When Lord Vasudev became silent after saying this, Akrur ji started thinking as he had kept the gem with him -॥ 139॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)