vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री विष्णु पुराण
»
अंश 4: चतुर्थ अंश
»
अध्याय 13: सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा
»
श्लोक 136
श्लोक
4.13.136
अयमपि च यज्ञादनन्तर मन्यत्क्रत्वन्तरं तस्यानन्तरमन्यद्यज्ञान्तरं चाजस्रमविच्छिन्नं यजतीति॥ १३६॥
अनुवाद
हम यह भी देखते हैं कि एक यज्ञ के बाद दूसरा यज्ञ होता है और तीसरा यज्ञ इसी प्रकार निरन्तर सम्पन्न होता रहता है ॥136॥
We also see that one Yagya is followed by another and the third one is performed continuously in this manner. 136॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×