श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 13: सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा  »  श्लोक 136
 
 
श्लोक  4.13.136 
अयमपि च यज्ञादनन्तर मन्यत्क्रत्वन्तरं तस्यानन्तरमन्यद्यज्ञान्तरं चाजस्रमविच्छिन्नं यजतीति॥ १३६॥
 
 
अनुवाद
हम यह भी देखते हैं कि एक यज्ञ के बाद दूसरा यज्ञ होता है और तीसरा यज्ञ इसी प्रकार निरन्तर सम्पन्न होता रहता है ॥136॥
 
We also see that one Yagya is followed by another and the third one is performed continuously in this manner. 136॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)