श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 13: सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  4.13.100 
वृथैवास्माभि: शतधनुर्घातितो न प्राप्तमखिलजगत्सारभूतं तन्महारत्नं स्यमन्तकाख्यमित्याकर्ण्योद्भूतकोपो बलदेवो वासुदेवमाह॥ १००॥
 
 
अनुवाद
“हमने शतधन्वा को व्यर्थ ही मार डाला, क्योंकि उसके पास स्यमन्तक मणि नहीं थी, जो सम्पूर्ण जगत् का सार है।” यह सुनकर बलदेवजी ने [यह समझकर कि श्रीकृष्णचन्द्र उस मणि को छिपाने के लिए ही ऐसी बातें बना रहे हैं] भगवान वासुदेव से क्रोधित होकर कहा-॥100॥
 
“We killed Shatadhanva in vain, because he did not have the Syamantaka gem, which is the essence of the entire world.” Hearing this, Baldevji [understanding that Shri Krishnachandra was making such things only to hide that gem] said angrily to Lord Vasudev – ॥ 100॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)