श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 11: यदुवंशका वर्णन और सहस्रार्जुनका चरित्र  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.11.12 
योऽसौ भगवदंशमत्रिकुलप्रसूतं दत्तात्रेयाख्यमाराध्य बाहुसहस्रमधर्मसेवानिवारणं स्वधर्मसेवित्वं रणे पृथिवीजयं धर्मतश्चानुपालनमरातिभ्योऽपराजयमखिलजगत्प्रख्यातपुरुषाच्च मृत्युमित्येतान्वरानभिलषितवाँल्लेभे च॥ १२॥
 
 
अनुवाद
अत्रिकुल में उत्पन्न भगवान दत्तात्रेयजी की आराधना करके सहस्त्रार्जुन ने अनेक वर मांगे थे और प्राप्त किए थे - 'हजार भुजाएँ, अधर्म का निवारण, स्वधर्म का आचरण, युद्ध द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय, धर्मानुसार प्रजा का पालन, शत्रुओं से अजेयता और तीनों लोकों में यशस्वी पुरुष से मृत्यु'॥12॥
 
By worshiping Lord Dattatreyaji, who was born in Atrikul, Sahasrarajuna had asked for and received many such boons - 'thousand arms, prevention of unrighteous conduct, practice of self-righteousness, conquest of the entire earth through war, maintenance of people according to religion, invincibility from enemies and death from the famous man of the three worlds'. 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)