श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 11: यदुवंशका वर्णन और सहस्रार्जुनका चरित्र  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  4.11.1 
श्रीपराशर उवाच
अत: परं ययाते: प्रथमपुत्रस्य यदोर्वंशमहं कथयामि॥ १॥ यत्राशेषलोकनिवासो मनुष्यसिद्धगन्धर्वयक्षराक्षसगुह्यककिंपुरुषाप्सरउरगविहगदैत्यदानवादित्यरुद्रवस्वश्विमरुद्देवर्षिभि-र्मुमुक्षुभिर्धर्मार्थकाममोक्षार्थिभिश्च तत्तत्फललाभाय सदाभिष्टुतोऽपरिच्छेद्यमाहात्म्यांशेन भगवाननादिनिधनो विष्णुरवततार॥ २॥ अत्र श्लोक:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशरजी बोले - अब मैं ययाति के प्रथम पुत्र यदुक के वंश का वर्णन करता हूँ, जिसमें मनुष्य, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, गुह्यक, किम्पुरुष, अप्सराएँ, सर्प, पक्षी, राक्षस, आदित्य, रुद्र, वसु, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, देवर्षि, मुमुक्षु तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की इच्छा रखने वाले पुरुषों द्वारा सदैव स्तुति किए जाने वाले, अखिल विश्व के विश्राम और सनातन भगवान विष्णु अपने अनंत प्राण अंश से अवतरित हुए थे। इस संबंध में यह श्लोक प्रसिद्ध है -॥1-3॥
 
Shri Parasharji said - Now I describe the lineage of Yaduka, the first son of Yayati, which includes humans, Siddhas, Gandharvas, Yakshas, ​​Rakshasas, Guhyakas, Kimpurushas, ​​Apsaras, snakes, birds, demons, Adityas, Rudras, Vasus, Ashvinikumars, Marudganas, Devarshis, Mumukshus and those who are always praised by men desirous of Dharma, Artha, Kama and Moksha, All-world rest and eternal Lord Vishnu had incarnated from his infinite vital part. This verse is famous in this regard -॥ 1-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)