श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 9: ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.9.5 
तेनैवोक्तं पठेद्वेदं नान्यचित्त: पुरस्स्थित:।
अनुज्ञातश्च भिक्षान्नमश्नीयाद‍्गुरुणा तत:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
गुरु के कहने पर ही उसके समक्ष बैठकर एकाग्रचित्त होकर वेदों का अध्ययन करना चाहिए। जब ​​गुरु आज्ञा दें, तभी भिक्षा लेनी चाहिए। ॥5॥
 
One should sit before the Guru and study the Vedas with full concentration only when he tells him to do so. One should eat alms only when he permits. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)