श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 8: विष्णु भगवान‍्की आराधना और चातुर्वर्ण्य-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.8.33 
शूद्रस्य सन्नतिश्शौचं सेवा स्वामिन्यमायया।
अमन्त्रयज्ञो ह्यस्तेयं सत्सङ्गो विप्ररक्षणम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
अत्यन्त विनय, शौच, भगवान् की निष्कपट सेवा, बिना मंत्र के यज्ञ, अस्तेय, सत्संग और ब्राह्मणों की रक्षा - ये शूद्र के मुख्य कर्तव्य हैं ॥33॥
 
Extreme humility, defecation, sincere service to the lord, yagya without mantra, asteya, satsang and protecting Brahmins – these are the main duties of a Shudra. 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)