श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 8: विष्णु भगवान‍्की आराधना और चातुर्वर्ण्य-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.8.24 
सर्वभूतहितं कुर्यान्नाहितं कस्यचिद् द्विज:।
मैत्री समस्तभूतेषु ब्राह्मणस्योत्तमं धनम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण को कभी किसी को कष्ट नहीं देना चाहिए तथा सभी जीवों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। ब्राह्मण का परम धन सभी जीवों में मैत्रीभाव रखना है। 24॥
 
A Brahmin should never harm anyone and should always remain active in the welfare of all living beings. The ultimate wealth of a Brahmin is to maintain friendship among all living beings. 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)