श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 5: शुक्लयजुर्वेद तथा तैत्तिरीय यजु:शाखाओंका वर्णन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.5.13 
यजूंष्यथ विसृष्टानि याज्ञवल्क्येन वै द्विज।
जगृहुस्तित्तिरा भूत्वा तैत्तिरीयास्तु ते तत:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हे द्विज! याज्ञवल्क्यजी द्वारा वमन की गई यजु-श्रुतियों को तीतर बनकर अन्य शिष्यों ने ग्रहण किया; इसलिए वे सब तैत्तिरीय कहलाए॥13॥
 
O twice born, the Yaju Shrutis vomited out by Yagyavalkya were accepted by the other disciples after becoming partridges; therefore they all came to be known as Taittireeya.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)