श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 4: ऋग्वेदकी शाखाओंका विस्तार  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.4.1 
श्रीपराशर उवाच
आद्यो वेदश्चतुष्पाद: शतसाहस्रसम्मित:।
ततो दशगुण: कृत्स्नो यज्ञोऽयं सर्वकामधुक्॥ १॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशरजी बोले - सृष्टि के आदि में भगवान् से प्रकट हुआ वेद ऋक्-यजुः, जो चार पादों वाला और एक लाख मन्त्रों वाला था, उसी से अग्निहोत्र आदि दस प्रकार के यज्ञ प्रचलित हुए, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं ॥1॥
 
Shri Parasharji said – In the beginning of the creation, the Veda Rik-Yaju, which emerged from God, consisted of four padas and had one lakh mantras. Due to that, ten types of yagyas like Agnihotra etc. which grant all the wishes were propagated. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)