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श्री विष्णु पुराण
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अंश 3: तृतीय अंश
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अध्याय 18: मायामोह और असुरोंका संवाद तथा राजा शतधनुकी कथा
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श्लोक 45
श्लोक
3.18.45
देवादिनि:श्वासहतं शरीरं यस्य वेश्म च।
न तेन संकरं कुर्याद् गृहासनपरिच्छदै:॥ ४५॥
अनुवाद
जिसका शरीर या घर देवता आदि के निःश्वास से नष्ट हो गया हो, उसके साथ अपना घर, आसन, वस्त्र आदि नहीं जोड़ना चाहिए ॥45॥
One should not associate his house, seat, clothes etc. with the one whose body or household is destroyed by the exhalation of the deity etc. ॥ 45॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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