श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 11: गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  3.11.77 
स्नातो यथावत्कृत्वा च देवर्षिपितृतर्पणम्।
प्रशस्तरत्नपाणिस्तु भुञ्जीत प्रयतो गृही॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
स्नान करके गृहस्थ को चाहिए कि वह विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण करे और हाथ में रत्न धारण करके पवित्रतापूर्वक भोजन करे ॥77॥
 
After taking bath, the householder should make offerings to the gods, sages and ancestors as per the prescribed procedure and eat food sacredly while holding a precious gem in his hand. 77॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)