श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 11: गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  3.11.63 
स्वाध्यायगोत्राचरणमपृष्ट्वा च तथा कुलम्।
हिरण्यगर्भबुद्धॺा तं मन्येताभ्यागतं गृही॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
गृहस्थ को चाहिए कि अतिथि से उसकी विद्या, वंश, आचरण और कुल के विषय में कुछ भी पूछे बिना ही हिरण्यगर्भ भाव से उसकी पूजा करे ॥ 63॥
 
A householder should worship a guest with a Hiranyagarbha mentality without asking him anything about his studies, lineage, behaviour and family. ॥ 63॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)