श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 11: गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  3.11.44-45 
तच्छेषं मणिके पृथ्वीपर्जन्येभ्य: क्षिपेत्तत:।
द्वारे धातुर्विधातुश्च मध्ये च ब्रह्मणे क्षिपेत्॥ ४४॥
गृहस्य पुरुषव्याघ्र दिग्देवानपि मे शृणु॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
शेष हवि को उदक पात्र में पृथ्वी और मेघों के निमित्त, द्वार के दोनों ओर ईश्वर और प्रजापति के निमित्त तथा भवन के मध्य में ब्रह्मा के निमित्त छोड़ दो। हे व्याघ्रपुरुष! अब मैं दिक्पालगणों की पूजा का वर्णन करता हूँ, सुनो। 44-45॥
 
Leave the remaining oblation in the Udaka Patra for the purpose of earth and clouds, on both sides of the door for the purpose of God and Creator and in the middle of the house for the purpose of Brahma. O male tiger! Now I describe the worship of Dikpalgana, listen. 44-45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)