श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 11: गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.11.38 
काम्योदकप्रदानं ते मयैतत्कथितं नृप।
यद्दत्त्वा प्रीणयत्येतन्मनुष्यस्सकलं जगत्।
जगदाप्यायनोद्भूतं पुण्यमाप्नोति चानघ॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! इस प्रकार मैंने तुम्हें अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए हवन करने की विधि बताई है, जिसके करने से मनुष्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को तृप्त करता है और हे पापी! ऐसा करने से वह ब्रह्माण्ड को तृप्त करने से मिलने वाले पुण्य को प्राप्त करता है ॥38॥
 
O King! Thus have I explained to you the method of offering something to satisfy one's desires, by performing which a man satisfies the entire universe and O sinful one! By doing this he obtains the merits which come from satisfying the universe. ॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)