श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 11: गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  3.11.33-34 
देवासुरास्तथा यक्षा नागगन्धर्वराक्षसा:।
पिशाचागुह्यकास्सिद्धा: कूष्माण्डा: पशव: खगा:॥ ३३॥
जलेचरा भूनिलया वाय्वाहाराश्च जन्तव:।
तृप्तिमेतेन यान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
[देवता को अर्घ्य देते समय इस प्रकार कहें-] 'देवता, दानव, यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध, कूष्माण्ड, पशु, पक्षी, जलचर, थलचर और वायुभक्षी आदि सभी प्रकार के प्राणी मेरे द्वारा दिए गए इस जल से तृप्त हों॥33-34॥
 
[At the time of offering the deity, say thus -] 'May all types of creatures like gods, demons, yakshas, ​​snakes, Gandharvas, demons, vampires, Guhyaks, Siddhas, Kushmandas, animals, birds, aquatics, terrestrials and air-eaters etc. be satisfied with this water given by me. 33-34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)