श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 11: गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  3.11.16-17 
वल्मीकमूषिकोद्भूतां मृदं नान्तर्जलां तथा।
शौचावशिष्टां गेहाच्च नादद्याल्लेपसम्भवाम्॥ १६॥
अणुप्राण्युपपन्नां च हलोत्खातां च पार्थिव।
परित्यजेन्मृदो ह्येतास्सकलाश्शौचकर्मणि॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! चींटी के बिल से निकाली हुई, चूहों द्वारा बिल से निकाली हुई, जल के अन्दर की, शौच से बची हुई, घर की लीपने की मिट्टी, चींटियों तथा अन्य छोटे जीवों द्वारा निकाली हुई तथा हल से उखाड़ी हुई - ऐसी सब प्रकार की मिट्टी को शौच के लिए प्रयोग न करो॥16-17॥
 
O King! Do not use all kinds of soils such as those from an anthill, taken out from a burrow by rats, from inside water, left over from defecation, plastering of a house, taken out by ants and other small creatures and uprooted by a plough - for defecation.॥ 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)