श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 11: गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  3.11.107 
अतिथिं चागतं तत्र स्वशक्त्या पूजयेद् बुध:।
पादशौचासनप्रह्वस्वागतोक्त्या च पूजनम्।
ततश्चान्नप्रदानेन शयनेन च पार्थिव॥ १०७॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान पुरुष को अपनी क्षमता के अनुसार अतिथि का स्वागत करना चाहिए । हे राजन ! अतिथि का स्वागत पहले उसके चरण धोकर, उसे आसन देकर, नम्रतापूर्वक स्वागत-वचन कहकर, फिर उसे भोजन कराकर तथा शयन-स्थान की व्यवस्था करके किया जाता है ॥107॥
 
A wise man should welcome the guest according to his capacity. O King! A guest is welcomed by first washing his feet, offering him a seat and saying polite words of welcome and then feeding him and arranging for a place to sleep.॥ 107॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)