श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 11: गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  3.11.101 
सर्वकालमुपस्थानं सन्ध्ययो: पार्थिवेष्यते।
अन्यत्र सूतकाशौचविभ्रमातुरभीतित:॥ १०१॥
 
 
अनुवाद
हे पार्थिव! यदि सूतक (पुत्रजन्म से होने वाली अशुद्धि), अशौच (मृत्यु से होने वाली अशुद्धि), उन्माद, रोग और भय आदि बाधाएँ न हों, तो प्रतिदिन संध्योपासना करनी चाहिए ॥101॥
 
Hey Parthiv! If there are no obstacles like Sutak (impurity caused by the birth of a son), Ashauch (impurity caused by death), frenzy, disease and fear etc. then one should do Sandhyopasana every day. 101॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)