श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 7: भूर्भुव: आदि सात ऊर्ध्वलोकोंका वृत्तान्त  »  श्लोक 32-34
 
 
श्लोक  2.7.32-34 
यथा च पादपो मूलस्कन्धशाखादिसंयुत:।
आदिबीजात्प्रभवति बीजान्यन्यानि वै तत:॥ ३२ ॥
प्रभवन्ति ततस्तेभ्य: सम्भवन्त्यपरे द्रुमा:।
तेऽपि तल्लक्षणद्रव्यकारणानुगता मुने॥ ३३॥
एवमव्याकृतात्पूर्वं जायन्ते महदादय:।
विशेषान्तास्ततस्तेभ्य: सम्भवन्त्यसुरादय:।
तेभ्यश्च पुत्रास्तेषां च पुत्राणामपरे सुता:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
हे ऋषि! जैसे बीज से मूल, तना, शाखा आदि सहित वृक्ष उत्पन्न होता है, फिर उससे और बीज उत्पन्न होते हैं, और उन बीजों से दूसरे वृक्ष उत्पन्न होते हैं और वे भी उन्हीं गुणों, द्रव्य और कारण से युक्त होते हैं, वैसे ही पहले अव्यक्त (आदि)- महत्तत्त्व से लेकर पंचभूत (पाँच तत्त्व) तक (समस्त परिवर्तन) उत्पन्न होते हैं और उनसे देवता, असुर आदि उत्पन्न होते हैं और फिर उनके पुत्र तथा उन पुत्रों के अन्य पुत्र उत्पन्न होते हैं॥ 32-34॥
 
O sage! Just as a tree with its roots, trunk and branches etc. is born from a seed and then more seeds are born from it, and from those seeds other trees are born and they too are endowed with the same characteristics, substance and cause, in the same way, first from the unmanifested (primordial)- Mahatattva (great element) to the Panchabhutha (five elements) [all the changes] are born and from them Devas, Asuras etc. are born and then their sons and other sons of those sons are born.॥ 32-34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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