श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 7: भूर्भुव: आदि सात ऊर्ध्वलोकोंका वृत्तान्त  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  2.7.25-26 
महान्तं च समावृत्य प्रधानं समवस्थितम्।
अनन्तस्य न तस्यान्त: संख्यानं चापि विद्यते॥ २५॥
तदनन्तमसंख्यातप्रमाणं चापि वै यत:।
हेतुभूतमशेषस्य प्रकृति: सा परा मुने॥ २६॥
 
 
अनुवाद
महातत्त्व भी प्रधान से आवृत है। वह अनन्त है, उसका कभी अन्त नहीं होता (नष्ट नहीं होता) और उसकी कोई संख्या नहीं है; क्योंकि हे मुनि! वह अनन्त, असंख्य, अपरिमेय और सम्पूर्ण जगत् का कारण है तथा वह परा प्रकृति है। ॥25-26॥
 
The Mahatattva is also covered by the Pradhan. It is endless; it never ends (destructs) and it has no number; because O Muni! It is endless, innumerable, irrational and the cause of the entire universe and it is the supreme nature. ॥25-26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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