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श्लोक 2.7.20  |
कृतकाकृतयोर्मध्ये महर्लोक इति स्मृत:।
शून्यो भवति कल्पान्ते योऽत्यन्तं न विनश्यति॥ २०॥ |
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| अनुवाद |
| इन कृतक और अकृतक त्रिलोकी के मध्य में महर्लोक कहा गया है, जो कल्प के अन्त में ही जनशून्य हो जाता है और पूर्णतः नष्ट नहीं होता [इसलिए इसे 'कृतककृत' कहते हैं] ॥20॥ |
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| In the middle of these Kritak and Akritak triloki is called Maharlok, which only becomes void of people at the end of the Kalpa and does not get completely destroyed [hence it is called 'Kritakakrit']. 20॥ |
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