श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 6: भिन्न-भिन्न नरकोंका तथा भगवन्नामके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.6.47 
वस्त्वेकमेव दु:खाय सुखायेर्ष्यागमाय च।
कोपाय च यतस्तस्माद्वस्तु वस्त्वात्मकं कुत:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
जब वही वस्तु सुख-दुःख और ईर्ष्या-क्रोध का कारण बन जाती है, तब उसमें विषय-निष्ठा (स्थिर स्वभाव) कहाँ रहती है?॥47॥
 
When the same thing becomes the cause of happiness and sorrow and jealousy and anger, then where is the objectivity (fixed nature) in it?॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)