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vishnu 2.6.43: हे मैत्रेय! जिसका मन जप, होम और अर्चनादिक कर्म करते हुए निरंतर भगवान वासुदेव में लगा रहता है, उसके लिए इन्द्रपद आदि के फल अन्तराय (बाधा) हैं। 43॥   |   vishnu अध्याय 2.6: भिन्न-भिन्न नरकोंका तथा भगवन्नामके माहात्म्यका वर्णन   ।   vishnu अंश 2: द्वितीय अंश   ।   श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 6: भिन्न-भिन्न नरकोंका तथा भगवन्नामके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.6.43 
वासुदेवे मनो यस्य जपहोमार्चनादिषु।
तस्यान्तरायो मैत्रेय देवेन्द्रत्वादिकं फलम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
हे मैत्रेय! जिसका मन जप, होम और अर्चनादिक कर्म करते हुए निरंतर भगवान वासुदेव में लगा रहता है, उसके लिए इन्द्रपद आदि के फल अन्तराय (बाधा) हैं। 43॥
 
O Maitreya! The one whose mind is continuously engaged in Lord Vasudev while doing Japa, Homa and Archanadi, for him the fruits of Indrapad etc. are antaraya (obstacle). 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)