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vishnu 2.15.26-27: वास्तव में मीठा मीठा होता ही नहीं; देखो, जब मैंने तुमसे मीठा भोजन माँगा था, तब मैं देखना चाहता था कि तुम क्या कहते हो। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! भोजन करने वाले के लिए क्या मीठा है और क्या बुरा? क्योंकि जब स्वादिष्ट भोजन समय के साथ खराब हो जाता है, तब वह कष्टदायक हो जाता है। (26-27)   |   vishnu अध्याय 2.15: ऋभुका निदाघको अद्वैतज्ञानोपदेश   ।   vishnu अंश 2: द्वितीय अंश   ।   श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 15: ऋभुका निदाघको अद्वैतज्ञानोपदेश  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  2.15.26-27 
मृष्टं न मृष्टमप्येषा जिज्ञासा मे कृता तव।
किं वक्ष्यसीति तत्रापि श्रूयतां द्विजसत्तम॥ २६॥
किमस्वाद्वथ वा मृष्टं भुञ्जतोऽस्ति द्विजोत्तम।
मृष्टमेव यदामृष्टं तदेवोद्वेगकारकम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
वास्तव में मीठा मीठा होता ही नहीं; देखो, जब मैंने तुमसे मीठा भोजन माँगा था, तब मैं देखना चाहता था कि तुम क्या कहते हो। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! भोजन करने वाले के लिए क्या मीठा है और क्या बुरा? क्योंकि जब स्वादिष्ट भोजन समय के साथ खराब हो जाता है, तब वह कष्टदायक हो जाता है। (26-27)
 
In reality, sweet is not even sweet; look, when I requested you for sweet food, I wanted to see what you say. Oh best of Brahmins! What is sweet and what is bad for the person who eats food? Because when a tasty food becomes bad with time, then it becomes disturbing. 26-27.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)