श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 15: ऋभुका निदाघको अद्वैतज्ञानोपदेश  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.15.21 
क्षुत्तृष्णे देहधर्माख्ये न ममैते यतो द्विज।
तत: क्षुत्सम्भवाभावात्तृप्तिरस्त्येव मे सदा॥ २१॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मण! भूख-प्यास तो शरीर के स्वभाव हैं, मेरे नहीं; अतः मैं कभी भूखा न रहने से सदैव संतुष्ट रहता हूँ॥ 21॥
 
O Brahmin! Hunger and thirst are the nature of the body, not mine; hence, since I am never hungry, I am always satisfied. ॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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