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vishnu 2.14.32: जैसे अभिन्न भाव से व्याप्त एक ही वायु की बाँसुरी के छिद्रों के भेद से नाना प्रकार प्रतीत होते हैं, वैसे ही [भौतिक उपाधियों के कारण] एक ही ईश्वर के अनेक प्रकार [देवता और मनुष्य] प्रतीत होते हैं। 32॥   |   vishnu अध्याय 2.14: जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद   ।   vishnu अंश 2: द्वितीय अंश   ।   श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 14: जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.14.32 
वेणुरन्ध्रप्रभेदेन भेद: षड्जादिसंज्ञित:।
अभेदव्यापिनो वायोस्तथास्य परमात्मन:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
जैसे अभिन्न भाव से व्याप्त एक ही वायु की बाँसुरी के छिद्रों के भेद से नाना प्रकार प्रतीत होते हैं, वैसे ही [भौतिक उपाधियों के कारण] एक ही ईश्वर के अनेक प्रकार [देवता और मनुष्य] प्रतीत होते हैं। 32॥
 
Just as the differences in the holes of a flute of the same air pervaded by the integral feeling lead to different types, in the same way [due to physical titles] there appear to be many different types of the same God [gods and humans]. 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)