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vishnu 2.13.35: वहाँ सूखी घास और पत्तों से शरीर का पोषण करते हुए वह मृग गति प्राप्त करने के लिए अपने पूर्व कर्मों के पापों का नाश करने लगा ॥35॥   |   vishnu अध्याय 2.13: भरत-चरित्र   ।   vishnu अंश 2: द्वितीय अंश   ।   श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 13: भरत-चरित्र  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.13.35 
शुष्कैस्तृणैस्तथा पर्णै: स कुर्वन्नात्मपोषणम्।
मृगत्वहेतुभूतस्य कर्मणो निष्कृतिं ययौ॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ सूखी घास और पत्तों से शरीर का पोषण करते हुए वह मृग गति प्राप्त करने के लिए अपने पूर्व कर्मों के पापों का नाश करने लगा ॥35॥
 
There, nourishing his body with dry grass and leaves, he began to abolish the sins of his past deeds in order to attain the state of a deer. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)