Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
vishnu 2.12.41: हे द्विज! क्या कोई भी वस्तु नष्ट होने वाली है? अनादि, मध्य और अन्त से रहित, नित्य एकरूप मन सर्वत्र विद्यमान है। जो वस्तु बार-बार बदलती रहती है और कभी एक सी नहीं रहती, उसमें क्या सत्य है? 41॥   |   vishnu अध्याय 2.12: नवग्रहोंका वर्णन तथा लोकान्तरसम्बन्धी व्याख्यानका उपसंहार   ।   vishnu अंश 2: द्वितीय अंश   ।   श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 12: नवग्रहोंका वर्णन तथा लोकान्तरसम्बन्धी व्याख्यानका उपसंहार  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  2.12.41 
वस्त्वस्ति किं कुत्रचिदादिमध्य-
पर्यन्तहीनं सततैकरूपम्।
यच्चान्यथात्वं द्विज याति भूयो
न तत्तथा तत्र कुतो हि तत्त्वम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
हे द्विज! क्या कोई भी वस्तु नष्ट होने वाली है? अनादि, मध्य और अन्त से रहित, नित्य एकरूप मन सर्वत्र विद्यमान है। जो वस्तु बार-बार बदलती रहती है और कभी एक सी नहीं रहती, उसमें क्या सत्य है? 41॥
 
Hey Dwija! Is there any diminishing object at all? The eternally uniform mind, without beginning, middle and end, is present everywhere. What is the reality in a thing which keeps changing again and again and never remains the same? 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)