श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान‍्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन  »  श्लोक 83-84
 
 
श्लोक  1.9.83-84 
नानौषधी: समानीय देवदैतेयदानवा:।
क्षिप्त्वा क्षीराब्धिपयसि शरदभ्रामलत्विषि॥ ८३॥
मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा च वासुकिम्।
ततो मथितुमारब्धा मैत्रेय तरसाऽमृतम्॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
हे मैत्रेय! देवताओं, दैत्यों और दानवों ने नाना प्रकार की औषधियाँ लाकर क्षीरसागर के उस जल में डाल दीं, जो शरद ऋतु के आकाश के समान निर्मल था, और मंदराचल को मथानी तथा वासुकि नाग को नेती बनाकर बड़े वेग से अमृत का मन्थन करने लगे॥83-84॥
 
O Maitreya! Gods, demons and demons brought different types of medicines and put them in the water of the milky ocean, which was as clear as the autumn sky, and made Mandarachal the churner and Vasuki the serpent the leader and started churning the nectar with great speed. 83-84॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)