श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान‍्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  1.9.57 
सर्वेश सर्वभूतात्म न‍् सर्व सर्वाश्रयाच्युत।
प्रसीद विष्णो भक्तानां व्रज नो दृष्टिगोचरम्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! हे परमात्मा! हे सर्वरूप! हे सर्वव्यापी! हे अच्युत! हे विष्णो! हम भक्तों पर प्रसन्न होकर हमें दर्शन दीजिए। 57॥
 
O Lord! O Supreme Soul! O all form! O omnipresent! O Achyuta! Hey Vishno! Please be pleased with us devotees and give us darshan. 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)