श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान‍्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  1.9.54 
यद्योगिन: सदोद्युक्ता: पुण्यपापक्षयेऽक्षयम्।
पश्यन्ति प्रणवे चिन्त्यं तद्विष्णो: परमं पदम्॥ ५४ ॥
 
 
अनुवाद
नित्य योगीजन अपने पुण्य-पापों के क्षीण हो जाने पर 'ॐ कार' का चिन्तन करके जिस अविनाशी पद को प्राप्त करते हैं, वह भगवान विष्णु का परम पद है ॥54॥
 
The imperishable pad which the daily yogis, when their virtuous deeds and sins get exhausted, realize by contemplating on 'Om Kar', is the supreme pad of Lord Vishnu. 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)