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श्री विष्णु पुराण
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अंश 1: प्रथम अंश
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अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन
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श्लोक 51
श्लोक
1.9.51
विशुद्धबोधवन्नित्यमजमक्षयमव्ययम्।
अव्यक्तमविकारं यत्तद्विष्णो: परमं पदम्॥ ५१ ॥
अनुवाद
जो शुद्ध, नित्य, अजन्मा, अक्षय, अव्यक्त, अव्यक्त और अपरिवर्तनशील है, वही विष्णु का परास्वरूप है॥51॥
The one who is pure, eternal, unborn, inexhaustible, unmanifested, unmanifested and unchangeable is the supreme form (Paraswaroop) of Vishnu. 51॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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