श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान‍्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  1.9.50 
भोक्तारं भोग्यभूतं च स्रष्टारं सृज्यमेव च।
कार्यकर्तृस्वरूपं तं प्रणता: स्म परं पदम्॥ ५० ॥
 
 
अनुवाद
हम उस परम पुरुष को नमस्कार करते हैं जो स्वयं ही भोक्ता और भोग्य है, रचयिता और सृजित है, कर्ता और फल है ॥50॥
 
We offer our obeisance to that Supreme Being who is Himself the enjoyer and the enjoyed, the creator and the created, the doer and the effect. ॥50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)