श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान‍्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  1.9.48 
कार्यकार्यस्य यत्कार्यं तत्कार्यस्यापि य: स्वयम्।
तत्कार्यकार्यभूतो यस्ततश्च प्रणता: स्म तम्॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
जो महतत्त्व के कार्य (अहंकार) का कार्य (तन्मात्रा-पंचक) है, जो उसके कार्य (भूत-पंचक) का कार्य (ब्रह्माण्ड) है और जो उसके कार्य (ब्रह्मा-दक्ष आदि) के कार्य (प्रजापतियों के पुत्र और पौत्र) हैं, उनको हम नमस्कार करते हैं। ॥48॥
 
We salute him who is the work (Tanmatra-Panchaka) of the work (Ahankar) of the work (Mahatattva), who is the work (Universe) of its work (Bhoota-Panchaka) and who is the work (sons and grandsons of Prajapatis) of its work (Brahma-Daksha etc.). ॥48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)