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श्री विष्णु पुराण
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अंश 1: प्रथम अंश
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अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन
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श्लोक 24
श्लोक
1.9.24
नाहं क्षमिष्ये बहुना किमुक्तेन शतक्रतो।
विडम्बनामिमां भूय: करोष्यनुनयात्मिकाम्॥ २४ ॥
अनुवाद
हे शतक्रतो! तुम बार-बार विनती क्यों करते हो? ऐसा कहने से क्या होगा? मैं तुम्हें क्षमा नहीं कर सकता॥ 24॥
O Satkrato! Why do you pretend to be pleading again and again? What will be achieved by your saying this? I cannot forgive you.॥ 24॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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