श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान‍्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.9.20 
दुर्वासा उवाच
नाहं कृपालुहृदयो न च मां भजते क्षमा।
अन्ये ते मुनय: शक्र दुर्वाससमवेहि माम्॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
दुर्वासाजी बोले - इन्द्र ! मैं दयावान नहीं हूँ, मेरे हृदय में क्षमा के लिए स्थान नहीं है। वे ऋषिगण भिन्न हैं; तुम समझ लो कि मैं दुर्वासा हूँ, है न?॥ 20॥
 
Durvasaji said - Indra! I am not a compassionate person, there is no place for forgiveness in my heart. Those sages are different; you must understand that I am Durvasa, right?॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)