इति सकलविभूत्यवाप्तिहेतु:
स्तुतिरियमिन्द्रमुखोद्गता हि लक्ष्म्या:।
अनुदिनमिह पठॺते नृभिर्यै-
र्वसति न तेषु कदाचिदप्यलक्ष्मी:॥ १४९॥
अनुवाद
इस प्रकार इन्द्र के मुख से कही गई लक्ष्मीजी की यह स्तुति समस्त ऐश्वर्यों की प्राप्ति का कारण है। जो लोग इसका प्रतिदिन पाठ करते हैं, उनके घर में कभी दरिद्रता नहीं आती। 149.
Thus this praise of Goddess Lakshmi uttered from the mouth of Indra is the cause of attainment of all the riches. Those who recite this daily will never face poverty in their homes. 149.
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे नवमोऽध्याय:॥ ९॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥