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श्री विष्णु पुराण
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अंश 1: प्रथम अंश
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अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन
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श्लोक 147
श्लोक
1.9.147
पठॺते येषु चैवेयं गृहेषु श्रीस्तुतिर्मुने।
अलक्ष्मी: कलहाधारा न तेष्वास्ते कदाचन॥ १४७॥
अनुवाद
हे ऋषिवर! जिन घरों में लक्ष्मीजी का यह स्तोत्र पढ़ा जाता है, वहाँ कलह का मूल रूपी दरिद्रता कभी नहीं टिकती ॥147॥
O sage! In those houses where this hymn to Goddess Lakshmi is recited, poverty which is the root of strife can never stay. ॥ 147॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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