श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान‍्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  1.9.137 
स्तोत्रेण यस्तथैतेन त्वां स्तोष्यत्यब्धिसम्भवे।
स त्वया न परित्याज्यो द्वितीयोऽस्तु वरो मम॥ १३७ ॥
 
 
अनुवाद
और हे समुद्रदेव! मुझे दूसरा वर दीजिए कि जो कोई इस स्तोत्र से आपकी स्तुति करे, आप उसे कभी न त्यागें। 137.
 
And O ocean-god, grant me the second boon that you should never forsake anyone who praises you with this hymn. 137.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)