श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान‍्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  1.9.135 
श्रीरुवाच
परितुष्टास्मि देवेश स्तोत्रेणानेन ते हरे।
वरं वृणीष्व यस्त्विष्टो वरदाहं तवागता॥ १३५॥
 
 
अनुवाद
श्रीलक्ष्मी ने कहा - हे देवेश्वर इन्द्र! मैं तुम्हारे इस स्तोत्र से अत्यन्त प्रसन्न हूँ; जो इच्छा हो, वही वर माँग लो। मैं तुम्हें वर देने के लिए ही यहाँ आई हूँ॥135॥
 
Sri Lakshmi said - O Deveshwar Indra! I am very pleased with this hymn of yours; ask for whatever boon you desire. I have come here only to grant you a boon.॥ 135॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)