श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान‍्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  1.9.133 
न ते वर्णयितुं शक्ता गुणाञ्जिह्वापि वेधस:।
प्रसीद देवि पद्माक्षि मास्मांस्त्याक्षी: कदाचन॥ १३३॥
 
 
अनुवाद
हे देवि! ब्रह्माजी की जिह्वा भी आपके गुणों का वर्णन करने में समर्थ नहीं है। [तब मैं क्या कर सकता हूँ?] इसलिए हे कमलनेत्र! अब मुझ पर प्रसन्न हो जाओ और मुझे कभी मत छोड़ो॥ 133॥
 
O Goddess! Even the tongue of Lord Brahma is not capable of describing your qualities. [Then what can I do?] Therefore, O lotus-eyed one! Be pleased with me now and never leave me.॥ 133॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)