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श्री विष्णु पुराण
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अंश 1: प्रथम अंश
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अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन
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श्लोक 13
श्लोक
1.9.13
प्रसाद इति नोक्तं ते प्रणिपातपुर:सरम्।
हर्षोत्फुल्लकपोलेन न चापि शिरसा धृता॥ १३ ॥
अनुवाद
अरे! तुमने न तो झुककर कहा कि 'तुमने बड़ा उपकार किया है' और न ही हर्ष और प्रसन्नता से उसे अपने सिर पर धारण किया॥13॥
Oh! You neither bowed down and said 'you have done a great favour' nor did you keep him on your head in joy and happiness.॥ 13॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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