श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान‍्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  1.9.127 
मान: कोशं तथा गोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम्।
मा शरीरं कलत्रं च त्यजेथा: सर्वपावनि॥ १२७॥
 
 
अनुवाद
हे सर्वपवित्र मातेश्वरी! आप हमारे कोष, गोष्ठ, घर, भोग, शरीर और स्त्री आदि का कभी त्याग न करें अर्थात् इनसे परिपूर्ण रहें ॥127॥
 
O all-holy Mateshwari! You should never abandon our Kosha (treasury), Goshtha (cattle shed), house, enjoyment, body and woman etc. i.e. be full of these. 127॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)