श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 9: दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान‍्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  1.9.115 
त्रैलोक्यं च श्रिया जुष्टं बभूव द्विजसत्तम।
शक्रश्च त्रिदशश्रेष्ठ: पुन: श्रीमानजायत॥ ११५॥
 
 
अनुवाद
हे द्विजोत्तम! त्रिलोकी समृद्ध हो गई और देवताओं में श्रेष्ठ इन्द्र भी पुनः स्वामी हो गए ॥115॥
 
O Dwijottam! Triloki became prosperous and Indra, the best among the gods, also became a master again. 115॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)